आज माघ मास, कृष्ण पक्ष, चतुर्थी तिथि को प्रथम पूज्य देव भगवान गणेश के प्रादुर्भाव दिवस के अवसर पर यह उल्लेखनीय है कि विघ्नहर्ता गणेश की पूजा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में भी प्राचीन काल से होती चली आ रही है। विभिन्न देशों से गणेश की अनेक प्राचीन और विशिष्ट मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, जो उनकी वैश्विक मान्यता को प्रमाणित करती हैं।
भगवान गणेश एकमात्र ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा हिंदुओं के साथ-साथ बौद्ध एवं जैन धर्मावलंबी भी करते हैं। इसी कारण आज गणेश एक अंतरराष्ट्रीय देवता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं।
नेपाल में गणेश पूजा
नेपाल में गणेश का अस्तित्व 10वीं शताब्दी से मिलता है, हालांकि 15वीं शताब्दी में सर्वप्रथम एक पांडुलिपि में गणेश का चित्रांकन प्राप्त हुआ। नेपाल में गणेश को सूर्य गणेश अथवा सूर्यवंशी माना जाता है। यहां नृत्य गणेश की प्रतिमाएं अधिक देखने को मिलती हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि यह स्वरूप नेपाल में विशेष रूप से लोकप्रिय है।
नेपाल की गणेश प्रतिमाओं में उनके सिर पर सर्प दर्शाया गया है, जिसके सिर को दाहिने हाथ और पूंछ को बाएं हाथ में पकड़े हुए दिखाया गया है। गणेश का यह विशिष्ट स्वरूप केवल नेपाल में ही देखने को मिलता है।
तिब्बत में गणेश पूजा
तिब्बत में गणेश का चित्रांकन पूज्य देवता के रूप में अपेक्षाकृत कम मिलता है। बेलुप्पा विहार में उन्हें द्वारपालक के रूप में दर्शाया गया है। कई स्थानों पर गणेश को हिंदू राक्षस विनायक के रूप में चित्रित किया गया है, जहां महाकाल उन्हें अपने पैरों तले दबाए हुए दिखाए गए हैं। एक अन्य स्थान पर अपराजिता देवी द्वारा गणेश को पराजित करते हुए दर्शाया गया है, जिसे गणपति समाक्रांता कहा गया है।
मलेशिया में गणेश पूजा
मलाया द्वीप समूह—विशेषकर जावा, बाली और बोर्नियो—में गणेश को मुण्डमालाधारी स्वरूप में दर्शाया गया है। जावा के परकरा नामक स्थान से 2239 ई. की लेखयुक्त पत्थर की एक दुर्लभ मूर्ति प्राप्त हुई है। इन क्षेत्रों में अधिकांश गणेश प्रतिमाएं बैठी अवस्था में हैं, जबकि पश्चिम जावा के करंग काटेश से प्राप्त प्रतिमा खड़ी अवस्था में है। जावा में कांस्य की गणेश मूर्तियां कम हैं, परंतु वे अत्यंत दुर्लभ और कलात्मक हैं।
म्यांमार में गणेश पूजा
म्यांमार में बौद्ध और हिंदू दोनों धर्मावलंबियों में गणेश समान रूप से लोकप्रिय हैं। यहां कांसे से बनी गणेश की अनेक प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं, जो उनके पूज्य स्वरूप को दर्शाती हैं।
थाईलैंड, कंबोडिया एवं इंडोनेशिया
थाईलैंड और हिंदचीन क्षेत्र में गणेश बौद्ध एवं हिंदू दोनों के प्रिय देवता रहे हैं। बैंकॉक के एक मंदिर में खमेर शैली की 10वीं शताब्दी की कांस्य गणेश प्रतिमा है, जिसमें गणेश को अपना दांत तोड़कर महाभारत लिखते हुए दिखाया गया है।
कंबोडिया में गणेश अत्यंत लोकप्रिय रहे हैं। यहां यह मान्यता है कि गायत्री मंत्र शिव की आज्ञा से स्वयं गणेश द्वारा कंबोडियाई निवासियों के लिए रचा गया। यहां की प्रतिमाओं में गणेश के तीन और चार दांत दर्शाए गए हैं।
चीन में गणेश पूजा
चीन में गणेश के दो प्रमुख स्वरूप मिलते हैं—पहला विनायक और दूसरा कांतिगेन रूप। कांतिगेन स्वरूप केवल चीन और जापान में मिलता है, जिसमें दो गणेश जुड़वां रूप में जुड़े हुए हैं।
विश्व की पहली तिथि-युक्त गणेश प्रतिमा चीन से ही प्राप्त हुई है, जो 531 ई. की है। 543 ई. की एक अन्य प्रतिमा वर्तमान में अमेरिका के बोस्टन संग्रहालय में सुरक्षित है। 9वीं शताब्दी तक गणेश चीन में लोकप्रिय देवता बन चुके थे।
जापान में गणेश पूजा
जापान में गणेश पूजा का प्रवेश चीन के माध्यम से हुआ। 9वीं शताब्दी में विद्वान कोबी-टाईशी के प्रयासों से बुद्ध के साथ गणेश की पूजा भी प्रारंभ हुई। जापान में गणेश के हाथों में मूली धारण करने की परंपरा प्रचलित है, जो वहां के लोककथाओं से जुड़ी हुई है।
यहां गणेश के दो स्वरूप—विनायक और कांगीतेन—मिलते हैं, जिनमें कांगीतेन स्वरूप अधिक लोकप्रिय है। जापान में प्राप्त गणेश प्रतिमाएं मानवीय रूप से अधिक निकट प्रतीत होती हैं और यहां चार हाथ-चार पैर वाली अद्वितीय प्रतिमा भी प्राप्त हुई है।
अन्य देश
श्रीलंका, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और गुयाना सहित अनेक देशों में भी गणेश प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इन देशों में भारतीय मूल के लोगों की बहुलता के कारण गणेश की पूजा भारतीय रीति-रिवाजों के अनुसार की जाती है।
वर्तमान समय में विश्व के जिन-जिन देशों में भारतीय समुदाय निवास करता है, वहां-वहां गणेश सहित भारतीय देवी-देवताओं की पूजा होती है। इस प्रकार भगवान गणेश आज न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय देवता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं।